दरिंदे"
किस मुह से हम माफी मागें, मानवता शर्मसार है।
भारत माँ की आज बेटियां, करतीं करुण पुकार हैं।।
कितना और गिरेगा मानव, कहना अब बेकार है।
नहीं सुरक्षित हैं अब बेटी, कैसा यह परिवार है।।
सहमी कभी हुई थी दिल्ली, निर्भया की चीत्कार है।
आज हैदराबाद की आत्मा, सबको कहे पुकार है।।
पशुता भी लज्जित है हमसे, आत्मा करे गुहार है।
ईश्वर से सब करें प्रार्थना, यह कैसा ब्यवहार है।।
किसे कौन अब सजा दिलाये, दरिंदों की भरमार है।
हे भगवान बचालो दुनिया, लीजै अब अवतार है।।
जब तक मानसिकता नहिं बदले, सभी सजा बेकार है।
मानव को मानव करदो प्रभु, बस इतनी दरकार है।।
मूल रूप से 'मां' है नारी, कुछ तो करो विचार है।
आज रो रहीं हैं 'माताएं', संतान हुई हत्यार हैं।।
अपराधी पकड़ें ट्रायल हो, यह सब विधि अनुसार है।
कितनी और निर्भया कब तक, करें न्याय इंतज़ार हैं।।
दिल्ली धरने पर जा बैठी, अन्नू कहे पुकार है।
सुरक्षा हित आवाज उठाई, तिस पर हुआ प्रहार है।।
आवो हम सब संकल्पित हों, नहीं और इंतजार है।
जन-जन की मानसिकता बदलें, नारी 'मां' अवतार है।।
'सादर श्रद्धांजलि'